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पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस: क्या 52 लाख करोड़ की खेती को मिलेगा कवच?

Sonal Shah 16 hours ago 0 0

भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था, जिसका मूल्य लगभग 52 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, इस समय प्रकृति और मौसम के बदलते मिजाज के बीच एक बड़े संकट से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन और विशेष रूप से अल नीनो (El Nino) के बढ़ते प्रभाव ने देश की खेती-बाड़ी पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच ‘पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस’ (Parametric Climate Insurance) की चर्चा तेज हो गई है। इसे किसानों और देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक नए और प्रभावी सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन और अल नीनो: खेती के लिए बड़ी चुनौती

भारत की कृषि मुख्य रूप से मानसूनी बारिश और अनुकूल मौसम पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के चक्र में काफी बदलाव आया है। अल नीनो जैसी भौगोलिक घटनाओं ने इस स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। अल नीनो के कारण अक्सर मानसून में देरी होती है या बारिश की कमी देखी जाती है, जिससे फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ता है। 52 लाख करोड़ रुपये की इस विशाल कृषि व्यवस्था के लिए मौसम में होने वाला मामूली बदलाव भी भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए अब पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस को एक समाधान के तौर पर पेश किया जा रहा है।

क्या है पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस?

पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस, जिसे ‘सूचकांक आधारित बीमा’ भी कहा जा सकता है, एक आधुनिक वित्तीय उपकरण है। यह पारंपरिक फसल बीमा योजनाओं से काफी अलग है। पारंपरिक बीमा में नुकसान का आकलन फसल कटने के बाद उसके वास्तविक नुकसान के आधार पर किया जाता है, जिसमें अक्सर समय अधिक लगता है। इसके विपरीत, पैरामेट्रिक इंश्योरेंस सीधे मौसम के विशिष्ट मानकों (Parameters) पर आधारित होता है। यह मॉडल किसी विशेष क्षेत्र में मौसम की चरम स्थितियों को ट्रैक करता है और उसके आधार पर सुरक्षा प्रदान करता है।

कैसे काम करता है यह सुरक्षा कवच?

इस बीमा मॉडल की कार्यप्रणाली पूरी तरह से डेटा और तकनीक पर आधारित है। इसमें भुगतान के लिए फसल के नुकसान का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि पहले से निर्धारित ‘ट्रिगर्स’ का उपयोग किया जाता है।

  • मानकों का निर्धारण: इसमें बारिश की मात्रा, तापमान की सीमा, हवा की गति या मिट्टी की नमी जैसे मानकों को आधार बनाया जाता है।
  • ऑटोमैटिक ट्रिगर: यदि किसी क्षेत्र में बारिश एक निश्चित मिलीमीटर से कम होती है या तापमान एक तय डिग्री से ऊपर चला जाता है, तो बीमा पॉलिसी स्वतः ही एक्टिव हो जाती है।
  • त्वरित सहायता: जैसे ही मौसम के आंकड़े तय सीमा को पार करते हैं, किसानों को भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है। इसमें किसी भौतिक निरीक्षण या लंबी कागजी कार्रवाई की जरूरत नहीं होती, जिससे किसानों को समय पर आर्थिक मदद मिल पाती है।

भारतीय किसानों के लिए क्यों जरूरी है यह मॉडल?

भारत में खेती जोखिम भरा काम मानी जाती है, जहाँ किसान पूरी तरह मौसम के भरोसे रहता है। पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस की जरूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि यह अनिश्चितता के समय में किसानों को तत्काल तरलता (Liquidity) प्रदान करता है। जब अल नीनो जैसी स्थितियों के कारण फसल बर्बाद होने का डर होता है, तब यह सुरक्षा कवच किसानों के निवेश को डूबने से बचा सकता है। इसके अलावा, यह मॉडल पारदर्शिता को बढ़ावा देता है क्योंकि यह पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ मौसम डेटा पर आधारित होता है।

निष्कर्षतः, 52 लाख करोड़ की कृषि संपदा को बचाने के लिए नए जमाने की तकनीकों और बीमा मॉडल्स को अपनाना अनिवार्य हो गया है। पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस न केवल किसानों को वित्तीय सुरक्षा देगा, बल्कि भारतीय कृषि को भविष्य की जलवायु चुनौतियों के प्रति अधिक लचीला और मजबूत भी बनाएगा।

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