केला एक ऐसी फसल है जिससे किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं, लेकिन अगस्त-सितंबर के महीने में बारिश के कारण केले के पौधों में सिगाटोका रोग फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यह रोग फफूंद जनित होता है और इसे पहचानना व समय रहते इसका इलाज करना किसानों के लिए बेहद जरूरी है।
सिगाटोका रोग क्या है?
सिगाटोका रोग केले के पौधों को प्रभावित करने वाला एक फफूंद जनित रोग है, जो पत्तियों पर दाग-धब्बे बनाता है और फसल को नुकसान पहुंचाता है। इस रोग के दो प्रमुख प्रकार हैं पीला सिगाटोका और काला सिगाटोका। दोनों ही प्रकारों से फलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित होता है।
पीला सिगाटोका के लक्षण:
- नए पत्तों के ऊपरी हिस्से पर हल्के पीले रंग के धब्बे या धारीदार लाइनों का बनना।
- धीरे-धीरे ये धब्बे बढ़कर भूरे रंग के हो जाते हैं।
- धब्बों के बीच का हिस्सा हल्का कत्थई रंग का दिखता है।
- इस रोग के कारण फलों की संख्या और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।
पीला सिगाटोका से बचाव:
- प्रतिरोधी किस्म के पौधे लगाएं।
- खेत को साफ-सुथरा रखें और खरपतवार हटाएं।
- रोगग्रस्त पत्तियों को तुरंत तोड़कर नष्ट कर दें।
- जलभराव न होने दें, पानी की निकासी ठीक रखें।
- मिट्टी में 1 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडे + 25 किलो गोबर की खाद मिलाएं।
काला सिगाटोका के लक्षण:
- पत्तियों के नीचे काले धब्बे या धारियां बनना।
- अधिक बारिश और गर्मी में तेजी से फैलता है।
- केले जल्दी पक जाते हैं, उत्पादन घटता है।
- आर्थिक नुकसान होता है।
काला सिगाटोका से बचाव:
- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 1 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें।
- खेत और पौधों के आसपास पानी जमा न होने दें।
- गंदगी और खराब पत्तियां इकट्ठी न होने दें।
- अनावश्यक सिंचाई से बचें, जरूरत के अनुसार पानी दें।
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