आज के दौर में जब पारंपरिक खेती से किसानों को वैसी आमदनी नहीं हो रही जैसी वे उम्मीद करते हैं, तो वे अब कुछ नए और फायदेमंद विकल्पों की तलाश में हैं। हर्बल फसलों की तरफ किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है, और उन्हीं में से एक है रोजमैरी की खेती।
आज के समझदार किसान अब सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे बाज़ार की मांग को भी समझ रहे हैं। ऐसे में रोजमैरी जैसी फसलें उन्हें न सिर्फ अच्छी कमाई देती हैं, बल्कि खेती को एक नया आयाम भी देती हैं।
क्या है रोजमैरी और क्यों है इसकी डिमांड?
रोजमैरी (Rosemary) एक सुगंधित, हरी-भरी झाड़ीदार औषधीय पौधा है, जिसकी पत्तियाँ खास तरह की खुशबू और औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। इसका इस्तेमाल कई रूपों में किया जाता है जैसे दवाइयों में, एरोमा ऑयल में, हर्बल चाय में, स्किन और हेयर प्रोडक्ट्स में, और यहां तक कि खाने में भी मसाले के तौर पर।
रोजमैरी की खेती क्यों है फायदेमंद?
- सूखा सहन करने वाला पौधा, ज्यादा पानी नहीं चाहिए
- कम खाद और देखरेख में भी अच्छा उत्पादन होता है
- एक बार लगाकर 4-5 साल तक खेती हो सकती है
- 1 हेक्टेयर से लगभग 50-60 लीटर रोजमैरी ऑयल मिलता है
- रोजमैरी ऑयल की कीमत ₹6,000 से ₹8,000 प्रति लीटर होती है
- सूखी पत्तियाँ भी ₹150 से ₹200 प्रति किलो बिकती हैं
किन राज्यों में हो रही है रोजमैरी की खेती?
आजकल रोजमैरी की खेती उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तेजी से बढ़ रही है। इन इलाकों के किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ रोजमैरी जैसी हर्बल और औषधीय फसलों की ओर भी रुचि दिखा रहे हैं, क्योंकि ये फसल कम निवेश में अच्छा मुनाफा देती है।
सरकार भी इस नए रुझान को बढ़ावा देने में सक्रिय है। किसानों को रोजमैरी और अन्य औषधीय पौधों की खेती के लिए सब्सिडी, तकनीकी मदद, और प्रशिक्षण उपलब्ध कराए जा रहे हैं ताकि वे बेहतर तरीके से खेती कर सकें और उत्पादन बढ़ा सकें।
हर्बल फसलों का बढ़ता क्रेज
आज की बदलती दुनिया में रोजमैरी जैसी हर्बल फसलें सिर्फ किसानों के लिए मुनाफे का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी एक बड़ा रास्ता बन रही हैं। देश में आयुर्वेद और हर्बल प्रोडक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि अब लोग ज्यादा सेहतमंद, प्राकृतिक और केमिकल-फ्री विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
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