भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा कदम उठाते हुए विश्व व्यापार संगठन (WTO) के फिशरीज सब्सिडी समझौते (AFS) को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह फैसला समुद्री संसाधनों के भविष्य और मछली पालन क्षेत्र में स्थिरता लाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस समझौते का मुख्य केंद्र समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना और उन सब्सिडी पर लगाम लगाना है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं।
भारत ने WTO के फिशरीज सब्सिडी समझौते को दी मंजूरी
विश्व व्यापार संगठन का यह फिशरीज सब्सिडी समझौता (AFS) एक वैश्विक प्रयास है, जिसका उद्देश्य समुद्र में मछली पकड़ने की प्रक्रियाओं को विनियमित करना है। भारत द्वारा इस समझौते को स्वीकार किए जाने का अर्थ है कि अब देश उन अंतरराष्ट्रीय नियमों का समर्थन करेगा, जो समुद्र में असंतुलन पैदा करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए हैं। सरकार के अनुसार, इस आधिकारिक मंजूरी से वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिबद्धता मजबूत होगी।
क्या है इस समझौते का मुख्य उद्देश्य?
इस पूरे समझौते की नींव समुद्री संसाधनों के संरक्षण पर टिकी है। समझौते का प्राथमिक लक्ष्य अवैध तरीके से मछली पकड़ने (Illegal Fishing) की गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। अक्सर देखा गया है कि विभिन्न देशों द्वारा दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी के कारण मछुआरे और बड़ी कंपनियाँ समुद्र के उन हिस्सों में भी मछली पकड़ते हैं, जहाँ इसकी अनुमति नहीं होती या जो नियमों के दायरे में नहीं आते।
इस समझौते के माध्यम से ऐसी सब्सिडी पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है, जो निम्नलिखित गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं:
- अवैध फिशिंग: वह मछली पकड़ना जो बिना अनुमति या नियमों के उल्लंघन में की जाती है।
- अनियमित फिशिंग: ऐसी गतिविधियाँ जिनकी रिपोर्टिंग नहीं की जाती और जो निगरानी से बाहर रहती हैं।
- ओवरफिशिंग (जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ना): समुद्र से उसकी क्षमता से अधिक मछलियाँ निकालना, जिससे प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है।
समुद्री संसाधनों के संरक्षण पर जोर
सरकार का स्पष्ट मानना है कि इस समझौते को मंजूरी देने से समुद्री मछलियों के संरक्षण में बड़ी मदद मिलेगी। समुद्र में बढ़ती ‘ओवरफिशिंग’ एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिससे न केवल मछलियों की संख्या कम हो रही है, बल्कि समुद्री जैव विविधता पर भी बुरा असर पड़ रहा है। जब सरकारी सब्सिडी का उपयोग केवल जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने के लिए किया जाता है, तो इससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है।
WTO के इन नए नियमों के लागू होने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि मछलियों का स्टॉक बना रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समुद्री संसाधन सुरक्षित रहें। यह समझौता सतत विकास (Sustainable Development) के लक्ष्यों को पूरा करने में एक अहम भूमिका निभाएगा।
मछुआरों और फिशिंग सेक्टर पर क्या होगा असर?
भारत द्वारा इस समझौते को स्वीकार करने का सीधा असर देश के फिशिंग सेक्टर और मछुआरों पर पड़ेगा। हालाँकि, समझौते का उद्देश्य सब्सिडी को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उन सब्सिडी को रोकना है जो हानिकारक गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं। इससे समुद्र में अवैध शिकार कम होगा, जिससे स्थानीय और छोटे मछुआरों को लंबी अवधि में लाभ मिलेगा, क्योंकि समुद्र में मछलियों की उपलब्धता बढ़ेगी।
सरकार की इस पहल से यह सुनिश्चित होगा कि मछली पकड़ने का व्यवसाय केवल आज के मुनाफे के लिए न होकर, भविष्य की सुरक्षा के लिए भी हो। अवैध और अनियमित फिशिंग पर लगाम लगने से भारतीय समुद्री सीमा में संसाधनों की सुरक्षा बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख मजबूत होगी।
निष्कर्ष
WTO के फिशरीज सब्सिडी समझौते को भारत की मंजूरी एक दूरदर्शी फैसला है। यह न केवल अवैध फिशिंग को रोकने में मदद करेगा, बल्कि समुद्र की सेहत सुधारने की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा। समुद्री संसाधनों का संरक्षण ही इस क्षेत्र से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है।
