बिहार के समस्तीपुर जिले में धान और मक्का की खेती करने वाले किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी सामने आई है। वर्तमान समय में फसलों की स्थिति को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने कीटों के हमले की संभावना जताई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय धान और मक्का की फसलें अपनी बढ़वार की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था में हैं, और इसी दौरान इन पर घातक कीटों का खतरा मंडरा रहा है।
धान और मक्का की फसल पर दोहरे कीटों का हमला
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, समस्तीपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में धान की फसल में तना छेदक (Stem Borer) और मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म (Fall Armyworm) का प्रकोप देखा जा रहा है। ये दोनों ही कीट फसलों को शुरुआती और बढ़वार के चरणों में भारी नुकसान पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि अगर समय रहते इनका नियंत्रण नहीं किया गया, तो पैदावार पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।
बढ़वार की अहम अवस्था में सावधानी जरूरी
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान और मक्का की फसलें इस समय जिस चरण में हैं, वह उनके विकास के लिए सबसे संवेदनशील समय है। इस अवस्था में कीटों का हमला सीधे तौर पर पौधों की जीवन शक्ति को प्रभावित करता है। तना छेदक कीट जहाँ धान के पौधों के अंदरूनी हिस्से को खोखला कर देता है, वहीं फॉल आर्मीवर्म मक्का की पत्तियों और कोमल हिस्सों को तेजी से चट कर जाता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने इस समय को प्रबंधन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना है।
वैज्ञानिकों ने सुझाई सही दवा और मात्रा
फसलों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि कीट नियंत्रण के लिए केवल दवा का छिड़काव पर्याप्त नहीं है, बल्कि दवा की सही मात्रा और सही चयन भी उतना ही जरूरी है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे कीटों के लक्षण दिखते ही वैज्ञानिक पद्धति से सुझाई गई दवाओं का उपयोग करें। वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि दवाओं का छिड़काव निर्धारित मात्रा में ही किया जाए ताकि फसल को नुकसान न हो और कीटों का प्रभावी ढंग से खात्मा किया जा सके।
सतर्कता ही बचाव का रास्ता
समस्तीपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपनी फसलों की नियमित निगरानी करने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि किसान खेत में जाकर पौधों की स्थिति को करीब से देखें। यदि धान में तना सूखने के लक्षण या मक्का की पत्तियों पर छिद्र दिखाई दें, तो इसे गंभीरता से लें। सही समय पर सही दवा और वैज्ञानिक सलाह का पालन करके ही इस खतरे को टाला जा सकता है और अच्छी पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है।
