भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कृषि क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए धान की सात नई जलवायु-सहिष्णु (Climate-Resilient) किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों के आने से धान की खेती में लगे किसानों के लिए मुनाफे और सुरक्षा के नए द्वार खुलने की उम्मीद है। विशेष रूप से नागालैंड जैसे क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है, ताकि वहां की खेती को अधिक आधुनिक और मौसम के बदलावों के प्रति लचीला बनाया जा सके।
कम समय में पककर तैयार होंगी किस्में
ICAR द्वारा विकसित इन नई किस्मों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कम अवधि में तैयार होने की क्षमता है। ये किस्में मात्र 120 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाती हैं। आमतौर पर धान की पारंपरिक किस्मों को तैयार होने में अधिक समय लगता है, जिससे फसल पर मौसम की मार पड़ने की संभावना बनी रहती है। 120 दिनों का यह चक्र न केवल किसानों का समय बचाएगा, बल्कि उन्हें अगली फसल की तैयारी के लिए भी पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा।
प्रति हेक्टेयर 5 से 7 टन की बंपर पैदावार
उत्पादकता के मामले में भी ये नई किस्में बेहद प्रभावशाली साबित होने वाली हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन 7 किस्मों की उपज क्षमता 5 से 7 टन प्रति हेक्टेयर के बीच है। अधिक पैदावार की यह क्षमता सीधे तौर पर किसानों की आय में वृद्धि करने में सहायक होगी। आधुनिक तकनीक और बेहतर बीजों के मिश्रण से तैयार ये किस्में कृषि क्षेत्र में कम लागत में अधिक लाभ सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का समाधान
इन किस्मों का विकास “जलवायु-सहिष्णु” श्रेणी में किया गया है। इसका अर्थ यह है कि ये किस्में बदलते मौसम, तापमान में उतार-चढ़ाव और अनियमित वर्षा जैसी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होंगी। वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है, तब ऐसी किस्में किसानों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करती हैं। यह विकास विशेष रूप से नागालैंड में धान की खेती को अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनाने के लिए किया गया है।
नागालैंड के कृषि परिदृश्य में होगा सुधार
ICAR का मुख्य उद्देश्य नागालैंड में धान की खेती को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है। वहां की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई ये सात किस्में न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी, बल्कि स्थानीय किसानों को जलवायु के प्रति अनुकूल खेती अपनाने के लिए भी प्रेरित करेंगी। 18 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली से जारी यह सूचना भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कृषि क्रांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
इन नई किस्मों के आने से यह स्पष्ट है कि कृषि अनुसंधान संस्थान अब ऐसी तकनीक पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो कम समय में, प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बेहतर परिणाम दे सकें। यह शोध भविष्य में अन्य फसलों के लिए भी एक मार्गदर्शक साबित हो सकता है।
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