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खाद वितरण व्यवस्था FFS पर सवाल, राजस्थान-बिहार में किसान परेशान

Sonal Shah 6 days ago 0 1

भारत में खेती-किसानी के लिए खाद (Fertilizer) की उपलब्धता हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार जिस ‘फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर सेल्स’ (FFS) पायलट प्रोजेक्ट को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है, जमीनी स्तर पर उसकी हकीकत कुछ अलग ही नजर आ रही है। सरकार जहाँ इस व्यवस्था को सफल बता रही है, वहीं देश के प्रमुख कृषि राज्यों से आ रही खबरें किसानों की बढ़ती परेशानियों की ओर इशारा कर रही हैं।

खाद के लिए मीलों का सफर तय कर रहे राजस्थान के किसान

राजस्थान के कृषि क्षेत्रों से खाद की किल्लत की खबरें सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यहाँ के किसानों को पर्याप्त खाद हासिल करने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि अन्नदाताओं को खाद के लिए अपने गांवों से 20 से लेकर 50 किलोमीटर तक की लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।

इतनी दूर जाने के बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि किसानों को खाद मिल ही जाएगी। लंबी यात्रा और खाद की अनिश्चितता ने किसानों के समय और पैसे, दोनों पर बुरा असर डाला है। राजस्थान में किसान इस नई व्यवस्था के कारण खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं, जबकि सरकारी फाइलों में प्रोजेक्ट की सफलता के दावे किए जा रहे हैं।

बिहार में निजी दुकानदारों की मनमानी और बढ़ते दाम

सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि बिहार के किसानों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। बिहार में खाद वितरण प्रणाली में खामियों के चलते निजी दुकानदारों पर गंभीर आरोप लग रहे हैं। खबरों के मुताबिक, बिहार के कई इलाकों में निजी दुकानदार किसानों से खाद के लिए निर्धारित दाम से काफी ज्यादा पैसे वसूल रहे हैं।

सरकारी वितरण व्यवस्था में आ रही रुकावटों का फायदा उठाकर निजी स्तर पर खाद की कालाबाजारी और मनमानी कीमतों का खेल चल रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर किसान पहले ही खेती की बढ़ती लागत से परेशान हैं, और अब खाद के लिए अतिरिक्त पैसे चुकाना उनके लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। बिहार में खाद की किल्लत और ऊंचे दामों ने खेती के मौजूदा सीजन में किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

किसान महापंचायत ने की व्यवस्था बंद करने की मांग

किसानों की इन समस्याओं को देखते हुए अब किसान संगठनों ने भी अपनी आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। किसान महापंचायत ने मौजूदा खाद वितरण व्यवस्था (FFS) को पूरी तरह से विफल करार दिया है। संगठन का कहना है कि यह व्यवस्था किसानों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है और इससे केवल अन्नदाताओं की परेशानियां ही बढ़ी हैं।

किसान महापंचायत ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि इस अव्यवहारिक व्यवस्था को तुरंत बंद किया जाए। किसानों का मानना है कि जब तक खाद की उपलब्धता सुलभ और सस्ती नहीं होगी, तब तक किसी भी पायलट प्रोजेक्ट को सफल नहीं माना जा सकता।

क्या वाकई सफल है FFS पायलट प्रोजेक्ट?

एक तरफ केंद्र सरकार का दावा है कि FFS पायलट प्रोजेक्ट कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएगा और खाद वितरण को सुचारू बनाएगा। दूसरी तरफ राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में खाद के लिए मची अफरा-तफरी इन दावों पर सवालिया निशान खड़ा करती है।

फिलहाल, सरकारी उपलब्धियों और किसानों के संघर्ष के बीच एक बड़ी खाई नजर आ रही है। यदि समय रहते वितरण प्रणाली को दुरुस्त नहीं किया गया और निजी दुकानदारों की मनमानी पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसका सीधा असर फसलों की पैदावार और किसानों की आय पर पड़ सकता है। खाद की किल्लत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कागजी आंकड़ों और धरातल की सच्चाई में बड़ा अंतर हो सकता है।

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