बिहार के कृषि क्षेत्र में मर्चा धान एक नई क्रांति लेकर आया है। पश्चिम चंपारण की खास पहचान माने जाने वाले इस धान ने न केवल अपनी खुशबू बिखेरी है, बल्कि इसे भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिलने के बाद से इसकी आर्थिक अहमियत भी काफी बढ़ गई है। चंपारण के किसान रामजी प्रसाद ने इस अवसर को पहचानते हुए मर्चा धान के उत्पादों के जरिए अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
GI टैग से मर्चा धान की कीमतों में उछाल
मर्चा धान को GI टैग मिलना स्थानीय किसानों के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हुआ है। रामजी प्रसाद के अनुसार, इस विशिष्ट पहचान के मिलने के बाद से बाजार में मर्चा धान की मांग में जबरदस्त इजाफा हुआ है। मांग बढ़ने का सीधा असर धान के भावों पर पड़ा है, जिससे किसानों को अब अपनी फसल का पहले से कहीं बेहतर दाम मिल रहा है। यह टैग न केवल फसल की शुद्धता को प्रमाणित करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी विश्वसनीयता बढ़ाता है।
परंपरागत तकनीक से आधुनिक मशीनों तक का सफर
मर्चा धान के चावल से चूड़ा (पोहा) बनाने का काम इस क्षेत्र में सदियों से किया जा रहा है। रामजी प्रसाद बताते हैं कि पहले इस प्रक्रिया में काफी समय और मेहनत लगती थी, क्योंकि धान की कुटाई पूरी तरह से हाथों से की जाती थी। हाथ से की जाने वाली कुटाई की वजह से उत्पादन सीमित रहता था और लागत अधिक आती थी।
बदलते समय के साथ, अब इस प्रक्रिया में आधुनिक मशीनों का प्रवेश हो गया है। मशीनों के जरिए कुटाई होने से न केवल समय की बचत हो रही है, बल्कि चूड़ा उत्पादन की क्षमता भी कई गुना बढ़ गई है। मशीनों के उपयोग से चूड़े की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, जिससे इसकी बाजार में स्वीकार्यता और बढ़ी है।
60 क्विंटल प्रति माह की सप्लाई और आर्थिक प्रगति
तकनीक और मांग के तालमेल ने रामजी प्रसाद के कारोबार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। वर्तमान में वे हर महीने लगभग 60 क्विंटल मर्चा चूड़ा की सप्लाई कर रहे हैं। इतने बड़े स्तर पर हो रहा उत्पादन और इसकी निरंतर बढ़ती मांग ने क्षेत्र के अन्य किसानों को भी प्रेरित किया है।
धान से चावल और फिर चावल से चूड़ा बनाने की इस वैल्यू चेन ने रोजगार और कमाई के नए अवसर पैदा किए हैं। मर्चा धान का चूड़ा अपनी विशेष सुगंध और स्वाद के लिए जाना जाता है, और अब GI टैग की वजह से इसे बड़े बाजारों तक पहुंचना आसान हो गया है।
किसानों के लिए मुनाफे का नया मॉडल
रामजी प्रसाद की सफलता यह दर्शाती है कि यदि पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीक और सरकारी पहचान (जैसे GI टैग) का साथ मिले, तो किसानों की आय में भारी वृद्धि की जा सकती है। मर्चा धान के भाव बढ़ने से न केवल रामजी प्रसाद, बल्कि क्षेत्र के उन तमाम किसानों को लाभ हो रहा है जो इस सुगंधित धान की खेती से जुड़े हैं।
आने वाले समय में मशीनीकरण और बेहतर मार्केटिंग के जरिए मर्चा चूड़ा का उत्पादन और अधिक बढ़ने की संभावना है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिलेगी।
