देश के अन्नदाता एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। इस बार विरोध की मुख्य वजह गन्ने की कीमतों में बढ़ोतरी की मांग है। महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक और उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा तक, गन्ना उत्पादक किसानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। किसानों का कहना है कि वर्तमान कीमतें उनकी लागत और मेहनत के मुकाबले काफी कम हैं, जिसके कारण उन्हें भारी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
कई राज्यों में थमी सड़कों की रफ्तार
गन्ना कीमतों में वृद्धि की मांग को लेकर किसानों का गुस्सा अब सड़कों पर दिखने लगा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। यहां किसानों ने न केवल पैदल मार्च निकाला है, बल्कि गन्ने से भरी अपनी ट्रॉलियों को सड़कों के बीचों-बीच खड़ा कर चक्का जाम कर दिया है। इस विरोध प्रदर्शन की वजह से कई मुख्य मार्गों पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। किसानों का यह आंदोलन केवल दक्षिण भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के राज्यों में भी इसकी गूँज सुनाई दे रही है।
हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विरोध का स्वर
उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कई जिलों में भी गन्ना किसान लामबंद हो रहे हैं। हरियाणा में विभिन्न किसान संगठनों ने कीमतों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। वहीं, उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है, वहां भी जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है। किसानों की स्पष्ट मांग है कि सरकार जल्द से जल्द गन्ने के राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) और उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) में संतोषजनक वृद्धि करे, ताकि किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिल सके।
लखनऊ में महापंचायत की तैयारी
इस आंदोलन को और अधिक प्रभावी और संगठित बनाने के लिए किसान संगठनों ने अब राजधानी का रुख करने का फैसला किया है। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) ने गन्ना कीमतों के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बड़ी महापंचायत बुलाई है। यह महापंचायत 3 नवंबर को आयोजित की जाएगी। इस बैठक में न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि अन्य पड़ोसी राज्यों के किसानों के जुटने की भी उम्मीद है।
इस महापंचायत का मुख्य उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाना और गन्ने के भाव को लेकर अपनी भावी रणनीति तय करना है। किसानों का मानना है कि जब तक वे एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद नहीं करेंगे, तब तक उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाएगा।
सरकार के खिलाफ लामबंदी
किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। सड़कों पर ट्रॉलियां खड़ी करना और पैदल मार्च निकालना इस बात का संकेत है कि ग्रामीण इलाकों में असंतोष गहराता जा रहा है। लखनऊ में होने वाली 3 नवंबर की महापंचायत को इस आंदोलन का टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। किसान नेताओं का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें सरकार के अगले कदम और 3 नवंबर को होने वाली महापंचायत के फैसलों पर टिकी हुई हैं।
